‘दक्षिण का चित्र’ दिखाता अनूठा संग्रहालय,दक्षिणचित्रा में सजी है समृद्ध विरासत की जीवंत तस्वीर

दक्षिण भारत की वास्तुकला,लोककला,शिल्प और जीवनशैली का अनूठा संगम; संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से रिसर्च लाइब्रेरी भी विकसित

 

रिपोर्ट विवेक राय 

वाराणसी। भारत की संस्कृति केवल इतिहास की किताबों में दर्ज विषय नहीं,बल्कि विविध परंपराओं,स्थापत्य कला,लोक शिल्प और जीवनशैली में आज भी जीवंत है। इसी जीवंत विरासत को करीब से महसूस करने का अनूठा अवसर प्रदान करता है चेन्नई के ईस्ट कोस्ट रोड (ECR) स्थित मुट्टुकाडु का दक्षिणचित्रा हेरिटेज म्यूजियम। करीब 10 एकड़ में फैला यह संग्रहालय दक्षिण भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का ऐसा अनूठा केंद्र है,जहां इतिहास को केवल देखा नहीं, बल्कि महसूस किया जा सकता है।

हाल ही में पीआईबी वाराणसी द्वारा आयोजित प्रेस टूर के दूसरे दिन पत्रकारों के एक दल ने दक्षिणचित्रा का भ्रमण किया और यहां संरक्षित दक्षिण भारत की पारंपरिक वास्तुकला,कला,शिल्प एवं जीवनशैली को करीब से जाना।

 

दक्षिणचित्रा का अर्थ है—‘दक्षिण का चित्र’। दिसंबर 1996 में मद्रास क्राफ्ट फाउंडेशन (MCF) द्वारा शुरू की गई इस दूरदर्शी परियोजना का उद्देश्य दक्षिण भारत की पारंपरिक कला,वास्तुकला,लोक जीवन और शिल्प परंपराओं को संरक्षित करना रहा है। तीन दशक की यात्रा में दक्षिणचित्रा दक्षिण भारत की सांस्कृतिक पहचान को देश-दुनिया के सामने प्रस्तुत करने वाला प्रमुख केंद्र बन चुका है।

 

दक्षिणचित्रा की सबसे बड़ी विशेषताओं में इसके 18 ऐतिहासिक धरोहर घर शामिल हैं। ये महज प्रतिकृतियां नहीं, बल्कि तमिलनाडु,केरल,कर्नाटक और आंध्र प्रदेश/तेलंगाना के विभिन्न क्षेत्रों से लाए गए वास्तविक पारंपरिक घर हैं।

आधुनिकीकरण के दौर में जब इन पुराने घरों के अस्तित्व पर संकट आया,तब दक्षिणचित्रा की टीम ने इनके विभिन्न हिस्सों—खंभों, खिड़कियों,दरवाजों और टाइलों आदि को सावधानीपूर्वक सुरक्षित किया। प्रत्येक हिस्से को क्रमांकित कर पुनः पारंपरिक कारीगरों की सहायता से संग्रहालय परिसर में उसी शैली में स्थापित किया गया।

यहां तमिलनाडु के चेट्टीनाड क्षेत्र की भव्य हवेलियों और बुनकरों के घरों से लेकर केरल की पारंपरिक लकड़ी की वास्तुकला,कर्नाटक तथा आंध्र प्रदेश/तेलंगाना के ग्रामीण एवं कृषि आधारित घरों तक दक्षिण भारत की विविध स्थापत्य परंपराओं की झलक देखने को मिलती है।

 

दक्षिणचित्रा की खासियत केवल ऐतिहासिक इमारतों तक सीमित नहीं है। यहां पारंपरिक शिल्पकारों को मंच और रोजगार का अवसर प्रदान करते हुए आगंतुकों को विभिन्न कलाओं को प्रत्यक्ष देखने और सीखने का अवसर मिलता है।

यहां कांच फूंकने की कला,मिट्टी के बर्तन निर्माण,रेशम एवं सूती वस्त्रों की पारंपरिक बुनाई तथा पत्थर और लकड़ी पर बारीक नक्काशी जैसी कलाओं का जीवंत प्रदर्शन किया जाता है। बच्चों और युवाओं को भी इन शिल्पों को स्वयं आजमाने का अवसर मिलता है,जिससे नई पीढ़ी पारंपरिक कलाओं और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ रही है।

सप्ताहांत में दक्षिण भारत के पारंपरिक लोकनृत्य एवं संगीत की प्रस्तुतियां भी आयोजित की जाती हैं,जो संग्रहालय के अनुभव को और अधिक जीवंत एवं आकर्षक बनाती हैं।

 

दक्षिणचित्रा के निदेशक शरथ नांबियार (Sharath Nambiar) ने प्रेस टूर के दौरान बताया कि यह संस्थान केवल पर्यटन का केंद्र नहीं,बल्कि दक्षिण भारतीय संस्कृति पर अध्ययन और शोध करने वालों के लिए भी महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने बताया कि संग्रहालय में स्थित रिसर्च लाइब्रेरी को केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय के सहयोग एवं अनुदान से विकसित किया गया है।

यह आधुनिक रिसर्च लाइब्रेरी कला,शिल्प,लोक परंपराओं, वास्तुकला और सांस्कृतिक विरासत के क्षेत्र में अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों एवं शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण संसाधन उपलब्ध कराती है। उन्होंने कहा कि हेरिटेज टूरिज्म को बढ़ावा देने और दक्षिण भारत की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने में केंद्र सरकार का सहयोग महत्वपूर्ण है।

 

दक्षिणचित्रा उत्तर और दक्षिण भारत के बीच सांस्कृतिक संवाद का एक महत्वपूर्ण सेतु भी बन रहा है। देश के विभिन्न हिस्सों से यहां पहुंचने वाले पर्यटक दक्षिण भारत की पारंपरिक जीवनशैली,पर्यावरण-अनुकूल वास्तुकला,लोक परंपराओं और सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों को करीब से समझते हैं।

 

इस तरह दक्षिणचित्रा केवल अतीत की धरोहर को संरक्षित करने वाला संग्रहालय नहीं,बल्कि भारत की ‘विविधता में एकता’ की भावना को मजबूत करने और ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की परिकल्पना को साकार करने वाला जीवंत सांस्कृतिक केंद्र बनकर उभर रहा है।

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