सनातन एवं वैष्णव परंपरा में राधा रानी को श्रीकृष्ण की परम आध्यात्मिक शक्ति के रूप में माना गया, निःस्वार्थ भक्ति और समर्पण का संदेश देता है पर्व
रिपोर्ट विरेंद्र प्रताप उपाध्याय
वाराणसी। राधा अष्टमी सनातन धर्म में राधा रानी के प्राकट्य उत्सव के रूप में मनाई जाती है। यह पर्व निःस्वार्थ भक्ति, दिव्य प्रेम और पूर्ण समर्पण की भावना से जुड़ा माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रीकृष्ण की आराधना में राधा रानी की भक्ति का विशेष महत्व है।
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व पर श्रद्धालु व्रत रखते हैं और विधि-विधान से राधा रानी की पूजा-अर्चना करते हैं। ब्रज क्षेत्र के बरसाना, वृंदावन और आसपास के क्षेत्रों में राधा अष्टमी विशेष धार्मिक उत्साह के साथ मनाई जाती है।
धार्मिक ग्रंथों में राधा रानी के प्राकट्य से जुड़ी विभिन्न कथाएं मिलती हैं। प्रस्तुत आलेख के अनुसार पद्म पुराण के ब्रह्म खंड में पृथ्वी पर अधर्म बढ़ने और पृथ्वी द्वारा भगवान ब्रह्मा से सहायता मांगने का प्रसंग वर्णित है। इसके बाद भगवान विष्णु द्वारा श्रीकृष्ण के रूप में पृथ्वी पर अवतरण तथा राधा रानी के भी ब्रज में प्रकट होने की धार्मिक कथा बताई गई है।
मान्यता के अनुसार राधा रानी ने राजा वृषभानु और माता कीर्तिदा के यहां पुत्री के रूप में प्राकट्य लिया।
गर्ग संहिता में राधा रानी को श्रीकृष्ण की परम आध्यात्मिक शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है। ब्रज की स्थानीय परंपराओं में राधा रानी के प्राकट्य से जुड़ी एक अन्य कथा भी प्रचलित है, जिसमें राजा वृषभानु द्वारा यमुना तट पर एक दिव्य कमल में बालिका के दर्शन करने और उसे अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार करने का वर्णन मिलता है।
सनातन धर्म की विशेष रूप से वैष्णव परंपरा में राधा रानी को श्रीकृष्ण की पराशक्ति और दिव्य प्रेम के स्वरूप के रूप में पूजा जाता है। धार्मिक साहित्य में भगवान की आंतरिक शक्तियों के संदर्भ में आनंद, अस्तित्व और ज्ञान से जुड़ी शक्तियों का उल्लेख मिलता है और राधा रानी को इनका सार माना गया है।
आलेख में वर्णित गर्ग संहिता की मान्यता के अनुसार राधा रानी और श्रीकृष्ण का विवाह भांडीर वन में हुआ था, जहां भगवान ब्रह्मा के पुरोहित बनने का प्रसंग आता है। धार्मिक परंपरा में यह प्रसंग राधा-कृष्ण के शाश्वत एवं दिव्य प्रेम से जोड़ा जाता है।
राधा अष्टमी केवल पूजा और व्रत का अवसर नहीं, बल्कि भक्ति, निःस्वार्थ प्रेम और पूर्ण समर्पण की आध्यात्मिक भावना से जुड़ा पर्व माना जाता है। इस दिन श्रद्धालु राधा रानी के चरणों में प्रार्थना कर मन की शुद्धता और आध्यात्मिक शांति की कामना करते हैं।




