बीएचयू के गौरवशाली अतीत और चिकित्सक प्रो. टीके लहरी के व्यक्तित्व को किया याद, अस्पताल में दुर्व्यवहार के कथित मामले पर जताई चिंता
रिपोर्ट : विवेक राय
हरहुआ (वाराणसी)। काशी हिंदू विश्वविद्यालय को अपनी ज्ञान और संस्कार की भूमि बताते हुए साहित्यकार एवं शिक्षाविद् डॉ. राघवेन्द्र नारायण सिंह ने विश्वविद्यालय की पुरानी परंपराओं और प्रोफेसर डॉ. टीके लहरी के व्यक्तित्व को याद किया। उन्होंने कहा कि बीएचयू केवल एक विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि महामना मदन मोहन मालवीय की भारतीयता, सेवा और राष्ट्र समर्पण की सोच का जीवंत स्वरूप है। यहां से जुड़े लाखों लोगों के जीवन में विश्वविद्यालय की स्मृतियां आज भी गहराई से बसी हुई हैं।
राजेश्वरी महिला महाविद्यालय में पत्रकारों से बातचीत के दौरान डॉ. सिंह ने कहा कि समय के साथ विश्वविद्यालय के शैक्षणिक एवं प्रशासनिक वातावरण में बदलाव आया है। उनके अनुसार, पहले शिक्षकों और कर्मचारियों में विश्वविद्यालय के प्रति समर्पण, सेवा, त्याग, विनम्रता और आत्मीयता की भावना प्रमुखता से दिखाई देती थी, लेकिन वर्तमान समय में इन मूल्यों में कमी चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि पहले विश्वविद्यालय के प्रत्येक विभाग में ऐसे विद्वान प्रोफेसर हुआ करते थे, जिनकी पहचान देश-विदेश तक होती थी।
डॉ. सिंह ने अस्सी के दशक की अपनी स्मृतियों को साझा करते हुए कहा कि वे जब बिरला छात्रावास में रहते थे, तब प्रोफेसर टीके लहरी को मेडिकल इन्क्लेव से सर सुंदरलाल अस्पताल आते-जाते देखा करते थे। सिर झुकाए, हाथ में छाता लिए धीमी और सधी चाल से पैदल चलने वाले लहरी साहब की छवि आज भी उनकी स्मृतियों में मौजूद है।
उन्होंने कहा कि प्रो. लहरी अपने अनुशासन, मरीजों के प्रति समर्पण, सादगी, दानशीलता और सहज व्यवहार के लिए जाने जाते थे। वे हर मरीज को समान दृष्टि से देखते थे और अपने कक्ष में निर्धारित क्रम से ही मरीजों को देखते थे। डॉ. सिंह के अनुसार, लहरी साहब का व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि उनकी डांट को भी लोग आशीर्वाद की तरह स्वीकार करते थे।
अस्पताल में कथित दुर्व्यवहार पर जताई चिंता
डॉ. सिंह ने कहा कि 85 वर्ष की आयु में प्रो. लहरी के साथ उसी अस्पताल में दुर्व्यवहार की खबर सामने आना पुरातन छात्रों, काशीवासियों और विश्वविद्यालय से जुड़े लोगों के लिए बेहद पीड़ादायक है। उन्होंने कहा कि यदि सामने आए दृश्य और समाचारों में लगाए गए आरोप सही हैं तो यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।
उन्होंने प्रो. टीके लहरी को महामना मालवीय की परिकल्पना के अनुरूप सेवा और संस्कार के प्रतीक बताते हुए कहा कि वे काशी हिंदू विश्वविद्यालय की गौरवशाली परंपरा के अनमोल पुष्प हैं। उन्होंने कहा कि इसी कारण इस प्रकरण को लेकर लोगों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।
डॉ. राघवेन्द्र नारायण सिंह ने जिला प्रशासन से प्रो. टीके लहरी के सम्मान, स्वाभिमान और उनकी सेवाओं को ध्यान में रखते हुए मामले में न्यायोचित कार्रवाई सुनिश्चित करने की मांग की। उन्होंने उम्मीद जताई कि विश्वविद्यालय में शिक्षक, कर्मचारी और प्रशासनिक पदों पर आसीन लोग महामना के आदर्शों, सेवा भावना और संस्कारों को पुनः आत्मसात करेंगे।




