सनातन संस्कृति पर टिप्पणी करने वालों के सामाजिक बहिष्कार की होगी रणनीति : अखिल भारतीय व्यास संघ
वाराणसी। तुष्टिकरण की राजनीति के तहत सनातन धर्म पर टिप्पणी करने और धार्मिक ग्रंथों को जलाने जैसी घटनाओं के खिलाफ अब अखिल भारतीय व्यास संघ ने मोर्चा खोल दिया है। संघ की ओर से पातालपुरी मठ, नरहरिपुरा में आयोजित राष्ट्रीय अधिवेशन में ऐसे लोगों के सामाजिक बहिष्कार की रणनीति पर चर्चा की गई।
अधिवेशन की अध्यक्षता राष्ट्रीय अध्यक्ष जगद्गुरु बालकदेवाचार्य महाराज ने की। इस दौरान देशभर के दस हजार से अधिक कथा वाचकों से जुड़े व्यासों ने हिस्सा लिया। अधिवेशन में व्यास पीठ की मर्यादा, हिंदुओं के धर्मांतरण, गऊ तस्करी और सनातन संस्कृति से जुड़े मुद्दों पर प्रस्ताव पारित किए गए।
निर्णय लिया गया कि व्यास पीठ को दलित बस्तियों में स्थापित कर वहां संस्कृति और संस्कार की शिक्षा दी जाएगी। धर्मांतरण कराने वालों की पहचान कर समाज को सतर्क किया जाएगा और गऊ तस्करों को संरक्षण देने वाले पुलिस कर्मियों पर कठोर कार्रवाई की मांग की जाएगी। यहां तक कि ऐसे पुलिस कर्मियों की संपत्ति तक जब्त करने का प्रस्ताव सामने आया।
राष्ट्रीय महामंत्री पंडित दिनेश त्रिपाठी ने कहा कि जिहाद और आतंकवाद से दुनिया त्रस्त हो चुकी है। ऐसे में समाज को संतों और धर्माचार्यों से उम्मीद है कि वे घर-घर जाकर सनातन संस्कृति के संरक्षण का कार्य करें।
कथा वाचकों से आह्वान किया गया कि वे केवल रामकथा तक सीमित न रहकर देशव्यापी अभियान चलाएं, लोगों को आने वाले खतरों से आगाह करें और रामराज्य की स्थापना की तैयारी में जुटें। प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलकर संतों और मठों की स्थिति से अवगत कराएगा। गांवों और बस्तियों में पदयात्रा निकालकर परिवारों को सनातन संस्कृति से जोड़ा जाएगा।
अधिवेशन में पं. डॉ. मदन मोहन मिश्र, पं. शिवाकांत मिश्र, महंत श्रवणदास, महंत अवध किशोर दास, महंत राघव दास, पं. गंगा सागर पांडेय, पं. धर्मराज शास्त्री, पं. अच्युतानंद पाठक, डॉ. पुण्डरीक शास्त्री, पं. सुरेश मिश्र, पं. दिनकर शास्त्री सहित अनेक कथा वाचक और आचार्य मौजूद रहे।
जगद्गुरु बालकदेवाचार्य महाराज ने कहा कि कथा के माध्यम से व्यास करोड़ों लोगों तक पहुंचते हैं। मानवीय संवेदनाओं—धैर्य, दया, करुणा, प्रेम और सद्भावना—का संरक्षण ही सनातन संस्कृति की असली पहचान है। इसके विस्तार से ही मानवता सुरक्षित रहेगी।




