काशी–तमिल संगमम में उत्तर–दक्षिण संस्कृति का अनोखा मिलन, मुख्यमंत्री योगी ने किया शुभारंभ
वाराणसी। गंगा तट पर सोमवार शाम काशी ने एक बार फिर उत्तर और दक्षिण भारत की सांस्कृतिक एकता का भव्य परिचय प्रस्तुत किया। मोघाट परिसर में काशी–तमिल संगमम के चौथे संस्करण का भव्य शुभारंभ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शंखनाद के साथ रिमोट दबाकर किया। इस अवसर पर प्रधानमंत्री और वाराणसी सांसद नरेन्द्र मोदी ने भी कार्यक्रम के लिए शुभकामनाएं प्रेषित कीं।
कार्यक्रम की थीम ‘तमिल करकलम’ रखी गई, जिसके अंतर्गत काशी और तमिलनाडु के कलाकारों ने संयुक्त रूप से पारंपरिक प्रस्तुतियाँ दीं। मंच पर हुई इस अनूठी परफॉर्मेंस ने देश की विविधता में निहित एकता और भारतीय संस्कृति की समृद्ध विरासत का जीवंत अहसास कराया।
उद्घाटन समारोह में तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि, पुदुच्चेरी के उपराज्यपाल के. कैलासनाथन, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, केंद्रीय राज्यमंत्री डॉ. एल. मुरुगन, तथा उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक सहित कई विशिष्टजन उपस्थित रहे।
इस अवसर पर राज्यपाल आर.एन. रवि ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तमिल समुदाय की संवेदनाओं को समझते हुए इस महत्वपूर्ण पहल की शुरुआत की, जो आज एक राष्ट्रीय सांस्कृतिक सेतु का रूप ले चुकी है।
उल्लेखनीय है कि काशी–तमिल संगमम का पहला संस्करण 2022 में आयोजित किया गया था, जो लगभग एक माह चला था। इसमें दोनों राज्यों के विद्वानों, कलाकारों, विद्यार्थियों और श्रद्धालुओं ने बढ़–चढ़कर हिस्सा लिया था।
चौथा संस्करण वाराणसी में शुरू हुआ है तथा इसका समापन रामेश्वरम में किया जाएगा।
कार्यक्रम से पूर्व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने एक्स (पूर्व ट्विटर) अकाउंट पर लिखा—
“काशी तमिल संगमम आज प्रारंभ हो रहा है। यह ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को और गहराई प्रदान करता है। सभी आगंतुकों को काशी में सुखद और यादगार प्रवास की शुभकामनाएँ।”
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी एक्स पर कहा—
“काशी–तमिल संगमम का यह चौथा संस्करण ‘लेट अस लर्न तमिल–तमिल करकलम’ थीम के साथ उत्तर और दक्षिण भारत की सांस्कृतिक धारा को पुनः एक सूत्र में बांधने का माध्यम बनेगा। प्रधानमंत्री मोदी के मार्गदर्शन में नया भारत सांस्कृतिक चेतना के गौरवपूर्ण उत्कर्ष पर है।”
काशी की पावन धरती पर शुरू हुआ यह आयोजन उत्तर और दक्षिण की परंपराओं, ज्ञान, आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक विरासत के सेतु को और अधिक सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।




