भीषण गर्मी में ग्रामीणों को नहीं मिल रहा पर्याप्त पानी, शिकायतों के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी मौन
(रिपोर्ट विरेंद्र प्रताप उपाध्याय)
चौबेपुर (वाराणसी)। विकास खंड चोलापुर अंतर्गत ग्राम सभा कौवापुर और कादीपुर स्टेशन से जुड़ी बस्तियों में प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी ‘हर घर जल-जल जीवन मिशन’ योजना ग्रामीणों के लिए राहत के बजाय परेशानी का कारण बनती जा रही है। कागजों में योजना का कार्य पूर्ण दिखाया जा चुका है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही तस्वीर बयां कर रही है।
ग्रामीणों का आरोप है कि इलाके में बिछाई गई पाइप लाइन बेहद पतली है, जिससे पर्याप्त मात्रा में पानी की सप्लाई नहीं हो पा रही। वहीं पानी टंकी के आसपास समतलीकरण और मिट्टी का कार्य भी अधूरा पड़ा है। कभी टंकी का वॉल्व खराब होने का बहाना बनाया जाता है तो कभी मौसम और धूप का हवाला देकर पानी की सप्लाई बंद कर दी जाती है।
भीषण गर्मी के बीच लोग बूंद-बूंद पानी के लिए परेशान हैं। ग्रामीणों के अनुसार सुबह पानी की सप्लाई शुरू होने पर उसकी रफ्तार इतनी धीमी रहती है कि तीन से चार बाल्टी भरते ही पानी खत्म हो जाता है। बड़ी आबादी वाले क्षेत्र में लोगों को पर्याप्त पेयजल नहीं मिल पा रहा है, जिससे लोगों में भारी नाराजगी है।
ग्रामीणों का कहना है कि बस्ती के लिए बनाई गई पानी की टंकी क्षेत्र की आबादी के हिसाब से काफी छोटी है। ऑपरेटर का कहना है कि टंकी भरने में छह से सात घंटे का समय लगता है, लेकिन लोगों का सवाल है कि जब सुबह सप्लाई शुरू होती है तो आधे घंटे में पानी आखिर कहां चला जाता है। कई घरों में पानी आधे घंटे से एक घंटे के भीतर ही बंद हो जाता है, जबकि गर्मियों में सुबह और शाम दोनों समय पानी की आपूर्ति होनी चाहिए।
गर्मी बढ़ने के कारण हैंडपंपों का जलस्तर भी नीचे चला गया है। ऐसे में ग्रामीणों, विशेषकर महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और बीमार लोगों को सबसे ज्यादा परेशानी उठानी पड़ रही है। कई लोगों को सुबह-सुबह दूसरे घरों में बाल्टी लेकर पानी मांगने जाना पड़ता है, जहां कई बार उन्हें निराशा भी हाथ लगती है।
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि शिकायत करने पर संबंधित अधिकारी फोन तक नहीं उठाते और न ही समस्या के समाधान के लिए कोई ठोस कदम उठाया जा रहा है। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध न होना योजना की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि ‘हर घर जल’ का सपना अब केवल सरकारी बोर्ड और कागजों तक सीमित रह गया है, जबकि जमीनी स्तर पर लोग आज भी पानी के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं।




