‘भगत सिंह : क्रांति से विचार तक’ विषय पर हुई संगोष्ठी, वक्ताओं ने उनके विचारों, संघर्ष और देशप्रेम पर की चर्चा
रिपोर्ट विरेंद्र प्रताप उपाध्याय
वाराणसी। शहीद भगत सिंह के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान थे। उनकी वीरता और अमर गाथा को लेकर प्रोफेसर बीएन जुयाल एजुकेशनल फाउंडेशन ट्रस्ट की ओर से ‘भगत सिंह : क्रांति से विचार तक’ विषय पर राष्ट्रीय वेबिनार संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में विभिन्न विद्वान वक्ताओं ने भगत सिंह के विचारों और उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की।
कार्यक्रम की शुरुआत ट्रस्ट के अध्यक्ष एवं शिक्षाविद् डा. अंबिका प्रसाद गौड़ के स्वागत संबोधन से हुई। उन्होंने कहा कि ऐसे ही शूरवीरों की बदौलत हम खुली हवा में सांस ले रहे हैं। विषय प्रवर्तन करते हुए वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार डा. अत्रि भारद्वाज ने कहा कि कुछ नाम इतिहास में दर्ज होने के साथ-साथ इतिहास की दिशा भी बदल देते हैं और भगत सिंह उन्हीं में से एक हैं।
मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर के पत्रकारिता विभागाध्यक्ष डा. कुंजन आचार्य ने कहा कि भगत सिंह के लिए क्रांति का अर्थ केवल बम और पिस्तौल का प्रयोग नहीं था, बल्कि अन्यायपूर्ण एवं शोषक सामाजिक व्यवस्था को बदलकर समानता आधारित व्यवस्था स्थापित करना था। आईकान एजुकेशनल फाउंडेशन, इंदौर के प्रोफेसर एस. कल्याण रमन ने भगत सिंह को आंदोलनकर्ता के साथ-साथ अध्येता बताया।
विनायकराव पाटिल कॉलेज, छत्रपति संभाजी नगर, औरंगाबाद के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर बलिराम थाप्से ने कहा कि भगत सिंह धर्म को कर्म से परिभाषित करते थे और संकीर्ण मान्यताओं के विरोधी थे। सनबीम सनसिटी वाराणसी की शिक्षिका नीलम राय ने कहा कि भगत सिंह इंसानियत, मानवता और देशप्रेम को सर्वोपरि मानते थे।
जेएनयू के प्रोफेसर रामबक्स जाट ने कहा कि केंद्र सरकार को भगत सिंह की स्मृति को जीवंत बनाए रखने के लिए दिल्ली में स्मारक बनाना चाहिए। वहीं धन्यवाद ज्ञापन करते हुए साहित्यकार डा. देवेंद्र कुमार सिंह ने कहा कि यह चिंता का विषय है कि नई पीढ़ी को स्वतंत्रता सेनानियों के जीवन परिचय से जोड़ा नहीं जा रहा है।




