दिनकर की कविताओं में आज भी झलकती है राष्ट्रीय चेतना
रिपोर्ट विरेंद्र प्रताप उपाध्याय
वाराणसी। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविताओं में संजोई गई राष्ट्रीय चेतना आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी आजादी की लड़ाई के दौर में थी। उन्होंने क्रांति, मानवीय मूल्यों, एकता और राष्ट्रधर्म की भावना जगाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। यह विचार “राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की राष्ट्रीय चेतना एवं आज का भारत” विषयक राष्ट्रीय वेबिनार में विद्वानों ने व्यक्त किए। कार्यक्रम का आयोजन प्रोफेसर बीएन जुयाल एजुकेशनल फाउंडेशन ट्रस्ट ने किया।
कार्यक्रम की शुरुआत ट्रस्ट के अध्यक्ष एवं शिक्षाविद् डॉ. अंबिका प्रसाद गौड़ ने स्वागत उद्बोधन से की। विषय स्थापना करते हुए वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार डॉ. अत्रि भारद्वाज ने कहा कि दिनकर की कविताओं के शब्द विद्वानों से लेकर आमजन तक सबके दिलों में जगह बना लेते थे। साहित्यकार प्रो. श्रद्धानंद ने उनके साहित्य को भारत की सांस्कृतिक व ऐतिहासिक धरोहर का आईना बताया और कहा कि दिनकर की रचनाएं आम लोगों को मजबूत राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरित करती हैं।
शिक्षाविद् रेनू राय ने कहा कि दिनकर सदैव आमजन के साथ खड़े रहे और शोषित-वंचितों को जगाने का कार्य किया। कथा लेखिका डॉ. मुक्ता ने उनकी कविताओं में मानवीय संवेदनाओं और नैतिक मूल्यों का गहन चित्रण बताया। कानपुर के ज्वाला देवी पीजी कॉलेज की प्रोफेसर गीता अस्थाना ने कहा कि दिनकर केवल स्वतंत्रता के लिए ही नहीं, बल्कि स्वतंत्रता के बाद समतामूलक समाज की स्थापना तक क्रांति की आवाज उठाते रहे।
‘लोकानुरंजन संसार’ की संस्थापिका कवयित्री प्रतिभा ‘प्रभा’ ने कहा कि दिनकर की रचनाएं आज भी राष्ट्र निर्माण, सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण की प्रेरणा देती हैं।
कार्यक्रम के अंत में साहित्यकार डॉ. देवेंद्र कुमार सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया और कहा कि सच्चा साहित्यकार कालजयी होता है।




