सुँगुलपुर में निःशुल्क न्यूरोलॉजी शिविर, 75 मरीजों की जांच — ब्रेन हेमरेज, लकवा व मिर्गी पर जागरूकता
रिपोर्ट विरेंद्र प्रताप उपाध्याय
चौबेपुर (वाराणसी)। सुँगुलपुर गांव स्थित त्र्यम्बक प्रांगण में आयोजित निःशुल्क न्यूरोलॉजी स्वास्थ्य शिविर में कुल 75 मरीजों की जांच, परामर्श एवं काउंसलिंग की गई। शिविर का शुभारंभ दोपहर तीन बजे हुआ, जिसमें आसपास के ग्रामीण इलाकों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। शिविर में बीएचयू के वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट प्रोफेसर विजय नाथ मिश्र की विशेष मौजूदगी रही।
शिविर के दौरान ब्रेन हेमरेज, लकवा, मिर्गी, सिरदर्द, चक्कर, झनझनाहट तथा नसों से संबंधित बीमारियों से पीड़ित मरीजों की जांच की गई। मरीज अपने साथ पुरानी जांच रिपोर्ट और चिकित्सकीय पर्चे लेकर पहुंचे, जिससे परामर्श अधिक प्रभावी हो सका। स्थानीय लोगों के अनुसार चौबेपुर क्षेत्र में यह पहली बार न्यूरोलॉजी ओपीडी का आयोजन हुआ।
इस स्वास्थ्य शिविर का आयोजन बीएचयू के जीन विज्ञानी प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे के प्रयासों से किया गया। क्षेत्र में न्यूरोलॉजी सेवाओं की कमी को देखते हुए की गई इस पहल को ग्रामीणों ने अत्यंत उपयोगी बताया। शिविर के दौरान वाचस्पति उपाध्याय और पुष्कर जी द्वारा मरीजों को निःशुल्क दवाइयां वितरित की गईं।
शिविर को संबोधित करते हुए प्रोफेसर विजय नाथ मिश्र ने कहा कि ठंड के मौसम में बुजुर्गों में ब्रेन हेमरेज और लकवे का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। उच्च रक्तचाप, बढ़ती उम्र और नशे की आदतें इस जोखिम को और गंभीर बना देती हैं। उन्होंने कहा कि ब्रेन हेमरेज या लकवा किसी भी परिवार के लिए वज्रपात के समान होता है, खासकर तब जब मरीज गांव या दूरदराज क्षेत्र में रहता हो।
प्रोफेसर मिश्र ने बुजुर्गों के लिए गांव स्तर पर सक्रिय समूह बनाने पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि आज बुजुर्गों की सबसे बड़ी समस्या अकेलापन और उपेक्षा है। यदि गांव या मोहल्ले में बुजुर्गों के संगठित समूह हों, तो उनकी नियमित निगरानी, दवाइयों का ध्यान और आपात स्थिति में त्वरित सहायता संभव हो सकती है। ऐसे समूह ब्रेन हेमरेज या लकवे की स्थिति में शुरुआती समय में सही निर्णय लेने में मददगार साबित होंगे।
उन्होंने बताया कि बेहोश मरीज को न खाना और न ही पानी देना चाहिए। मरीज को अस्पताल ले जाते समय करवट देकर रखना आवश्यक है। जरूरत पड़ने पर नाक के माध्यम से ट्यूब डालकर तरल देना जीवनरक्षक हो सकता है। संयम, धैर्य, नियमित फिजियोथेरेपी और चिकित्सक की सलाह से दवाइयां जारी रखने पर लकवे के मरीजों में सुधार संभव है।
प्रोफेसर मिश्र ने मिर्गी को लेकर समाज में फैली गलत धारणाओं पर भी खुलकर चर्चा की। उन्होंने कहा कि मिर्गी कोई अभिशाप नहीं, बल्कि एक सामान्य न्यूरोलॉजिकल रोग है। झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र या प्रताड़ना अमानवीय है। मिर्गी के करीब 85 प्रतिशत मरीज नियमित और सही दवा से सामान्य जीवन जी सकते हैं। मरीजों को पढ़ाई, नौकरी और सामाजिक जीवन से दूर करना गलत है।
उन्होंने कहा कि यदि गांव स्तर पर बुजुर्गों के समूह बनाए जाएं, मिर्गी जैसे रोगों को लेकर जागरूकता फैलाई जाए और नियमित स्वास्थ्य शिविर आयोजित हों, तो ब्रेन हेमरेज, लकवा और मिर्गी से होने वाली मौतों और पीड़ा को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
इस अवसर पर वल्लभाचार्य पांडेय, गौरीशंकर यादव, शारदा चतुर्वेदी, कृषि वैज्ञानिक अखिलेश चौबे, अतुल चतुर्वेदी, व्यापार मंडल अध्यक्ष नन्हे जायसवाल, पूर्व प्रधान सौरभ तिवारी, शिव बचन, प्रधान मनीष चौहान, ऐरा ट्वेंटी फर्स्ट के प्रबंधक विनोद सिंह सहित क्षेत्र के अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।




