एक सप्ताह बाद शुरू होनी थी कटाई, जलभराव से फसल सड़ने का खतरा; आलू, सरसों और मटर की बुवाई पर भी पड़ेगा असर
रिपोर्ट विरेंद्र प्रताप उपाध्याय
चौबेपुर (वाराणसी)। क्षेत्र में मौसम के अचानक बदले मिजाज ने किसानों की परेशानी बढ़ा दी है। तेज हवाओं के साथ हुई रिमझिम बारिश से पककर तैयार हो चुकी धान की फसल खेतों में ही गिरकर बिछ गई है। पहले से खेतों में पानी भरा होने के कारण अब फसल के सड़ने और धान के दाने खराब होने की आशंका सताने लगी है। फसल तैयार होने के अंतिम चरण में मौसम की मार पड़ने से किसानों को भारी आर्थिक नुकसान की चिंता है।
गरथौली निवासी किसान दुर्गेश चौबे ने बताया कि उनकी खेती कौआपुर, परानापुर और गरथौली गांव में है। गरथौली और कौआपुर में उन्होंने बटाई पर खेती दे रखी है, जबकि परानापुर में स्वयं मजदूर लगाकर धान की रोपाई कराई थी। इस बार फसल की स्थिति अच्छी थी और करीब एक सप्ताह बाद कटाई शुरू करने की तैयारी थी। इसी बीच तेज हवा और बारिश ने पूरी मेहनत पर पानी फेर दिया। खेतों में खड़ी धान की फसल जमीन पर गिर गई है।
उन्होंने बताया कि 20 बिस्वा खेत में जुताई, नर्सरी तैयार करने, रोपाई, खाद और सिंचाई सहित अब तक 10 हजार रुपये से अधिक की लागत लग चुकी है। फसल तैयार होने के समय हुए इस नुकसान से लागत निकालना भी मुश्किल दिखाई दे रहा है। खेतों में पानी जमा होने से गिरी हुई फसल की बालियां सड़ने और दानों की गुणवत्ता खराब होने का खतरा बढ़ गया है।
किसान दुर्गेश चौबे के मुताबिक, पिछले वर्ष भी बेमौसम बारिश और तेज हवाओं के चलते फसल को नुकसान उठाना पड़ा था। लगातार मौसम की मार से खेती का खर्च निकालना मुश्किल होता जा रहा है। हालात ऐसे हो गए हैं कि अब लोग बटाई पर खेत लेने से भी कतरा रहे हैं। किसानों के सामने न केवल मौजूदा फसल बचाने, बल्कि अगली फसल की तैयारी करने की चुनौती भी खड़ी हो गई है।
धान की फसल खेतों में गिरने से कटाई में देरी होने की संभावना है। जमीन पर बिछी फसल को काटने में सामान्य से अधिक समय और मजदूरी लगेगी। इसका असर रबी सीजन की तैयारियों पर भी पड़ेगा। धान की कटाई समय से नहीं हो पाने पर आलू, सरसों और मटर की बुवाई पिछड़ सकती है। बुवाई में देरी होने से इन फसलों की पैदावार प्रभावित होने की आशंका भी जताई जा रही है।
मौसम की मार से परेशान किसानों ने प्रशासन और कृषि विभाग से प्रभावित खेतों का स्थलीय निरीक्षण कराने की मांग की है। किसानों का कहना है कि नुकसान का निष्पक्ष आकलन कराकर उन्हें उचित मुआवजा दिया जाए, जिससे खेती में लगी पूंजी के नुकसान की कुछ भरपाई हो सके और वे आगामी फसलों की बुवाई कर सकें।





