कमलाकांत दुबे हत्याकांड में आर्थिक सहयोग बनाम जवाबदेही की बहस तेज
रिपोर्ट अभिषेक उपाध्याय
भदोही। 10 दिसंबर 2025 की रात लगभग 9:30 बजे भदोही के धसखरी गांव में समाजसेवी कमलाकांत दुबे की कार से कुचलकर हत्या कर दी गई। इस जघन्य घटना के बाद न केवल पुलिस-प्रशासन की कार्यशैली, बल्कि प्रदेश की कानून-व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। न्याय की उम्मीद लगाए परिवार और युवाओं के संघर्ष के बीच अब यह बहस तेज हो गई है कि आर्थिक सहयोग ज्यादा अहम है या न्याय की ठोस पहल।
हत्या के बाद पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठे। जिस आरोपी को तत्काल गिरफ्तार किया जाना चाहिए था, उसने पुलिस की नाक के नीचे से अदालत में सरेंडर कर दिया। एक अन्य आरोपी की अगले दिन गिरफ्तारी हुई। इसके बाद राजनीतिक और सामाजिक संगठनों द्वारा पीड़ित परिवार से मुलाकात, शोक संवेदना, न्याय की मांग और आर्थिक सहयोग का सिलसिला शुरू हो गया।
औराई विधायक दीनानाथ भास्कर ने पीड़ित परिवार से मिलकर 10 हजार रुपये की सहायता दी और मुख्यमंत्री से मिलवाकर न्याय दिलाने का भरोसा दिया। राष्ट्रीय ब्राह्मण युवजन सभा ने क्राउड फंडिंग के माध्यम से लाखों रुपये की सहायता जुटाई। मिर्जापुर और भदोही के कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और युवाओं ने भी आर्थिक सहयोग के साथ हर स्तर पर लड़ाई का आश्वासन दिया।
इसके बाद ज्ञानपुर विधायक विपुल दुबे ने परिवार को 50 हजार रुपये की मदद दी और आरोपियों पर गैंगस्टर एक्ट लगाने तथा मुख्यमंत्री से मिलवाने का वादा किया। भदोही सांसद डॉ. विनोद बिंद ने भी परिवार से मिलकर न्याय का भरोसा दिया, हालांकि उन्होंने आर्थिक सहायता नहीं दी।
इसी क्रम में जिला पंचायत सदस्य एवं भाजपा काशी प्रांत से जुड़े नेता अमित सिंह ‘प्रिंस’ पीड़ित परिवार के घर पहुंचे। उन्होंने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए परिवार को एक लाख रुपये का चेक दिया और इसकी तस्वीरें भी खिंचवाईं। हालांकि, जब एक वरिष्ठ पत्रकार द्वारा उनसे बयान लेने का आग्रह किया गया तो उन्होंने यह कहते हुए मना कर दिया कि “यह दिखाने की चीज नहीं है।”
लेकिन दूसरी ओर, चेक देते समय खिंचवाई गई तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा की गईं, जिन्हें समर्थकों द्वारा प्रचारित किया गया। इसी को लेकर अब सवाल उठ रहे हैं कि अगर सहयोग दिखाने की चीज नहीं है, तो तस्वीरें क्यों?
पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि बयान दिया जाता तो चर्चा केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सरकार की कानून-व्यवस्था, न्याय प्रक्रिया और आगे की कार्रवाई पर भी सवाल उठते।
आलोचकों का तर्क है कि जिला स्तर के नेता होने के नाते अमित सिंह ‘प्रिंस’ को अपनी सरकार और सिस्टम की जवाबदेही पर खुलकर बोलना चाहिए था, न कि कैमरे से दूरी बनानी चाहिए थी।
अब सवाल यह भी उठ रहा है कि
क्या पीड़ित परिवार को सरकार से 50 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दिलाने के लिए कोई ठोस प्रयास होगा?
क्या आरोपियों पर गैंगस्टर एक्ट लगाने के लिए राजनीतिक दबाव बनाया जाएगा?
या फिर सहायता केवल चेक और फोटो तक सीमित रह जाएगी?
सामाजिक संगठनों और युवाओं का कहना है कि पैसा अस्थायी है, लेकिन न्याय स्थायी मिसाल बनता है। कमलाकांत दुबे के परिवार को आर्थिक सहयोग के साथ-साथ त्वरित और कठोर न्याय मिलना चाहिए, ताकि न्याय के लिए संघर्ष कर रहे लोगों के हौसले कमजोर न हों।
रामसेतु निर्माण में गिलहरी के कंकड़ की तरह, हर छोटा प्रयास महत्वपूर्ण है—लेकिन न्याय की दिशा में उठाया गया एक मजबूत कदम किसी भी बड़े दान से कहीं अधिक मूल्यवान होता है।






