बरसठी में नेताओं के दोहरे चरित्र से उबल रहा जनआक्रोश
रिपोर्ट अभिषेक उपाध्याय
बरसठी (जौनपुर)। बरसठी क्षेत्र में चुनाव नजदीक आते ही कुछ चेहरे अचानक “गरीबों के मसीहा” बनकर सड़कों पर उतर आते हैं। वर्षों तक न किसी गरीब के आंसू पोंछते दिखे, न किसी शोषित के साथ खड़े नजर आए, वही नेता चुनाव के समय खुद को जुझारू, ईमानदार और संघर्षशील बताकर जनता को लुभाने में जुट जाते हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि यह संघर्ष नहीं, बल्कि सत्ता पाने का छलावा है। जैसे ही वोट मिलते हैं और कुर्सी हासिल होती है, नेताओं का असली चेहरा सामने आ जाता है। जनता से मिलने के लिए समय न होने का बहाना बनाया जाता है और समस्याएं लेकर पहुंचने वालों के साथ ऐसा व्यवहार होता है मानो वे अपना अधिकार नहीं, बल्कि भीख मांगने आए हों।
क्षेत्र में सबसे ज्यादा नाराजगी विकास कार्यों को लेकर है। ग्रामीणों का आरोप है कि विकास के नाम पर पूरा बजट पास कराया जाता है, लेकिन धरातल पर काम केवल 40–50 प्रतिशत ही होता है। शेष धन ठेकेदारों और सत्ता से जुड़े दलालों की जेब में चला जाता है, जबकि मंचों से ईमानदारी और पारदर्शिता के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं।
नेताओं के इस दोहरे रवैये को लेकर बरसठी क्षेत्र में जनाक्रोश बढ़ता जा रहा है। लोगों का कहना है कि अब वे सिर्फ भाषणों और झूठे वादों से बहकने वाले नहीं हैं और आने वाले समय में ऐसे नेताओं को सबक सिखाने का मन बना चुके हैं।





