राष्ट्रीय वेबिनार में विद्यालयों में साहित्य आधारित नैतिक शिक्षा को बढ़ावा देने पर हुआ मंथन
रिपोर्ट : विरेंद्र प्रताप उपाध्याय
SHREE 7NEWS, वाराणसी। प्रोफेसर बी.एन. जुयाल एजुकेशनल फाउंडेशन ट्रस्ट द्वारा आयोजित ‘विद्यालयों में नैतिक शिक्षा के साहित्यिक आयाम’ विषयक राष्ट्रीय वेबिनार संगोष्ठी में देशभर के शिक्षाविदों एवं साहित्यकारों ने नैतिक मूल्यों के विकास में साहित्य की महत्त्वपूर्ण भूमिका पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने कहा कि साहित्य मनुष्य में संवेदना, संस्कार और चरित्र निर्माण की भावना विकसित करता है, इसलिए विद्यालयों में साहित्य आधारित नैतिक शिक्षा को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए।
कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए ट्रस्ट के अध्यक्ष एवं शिक्षाविद् डॉ. अंबिका प्रसाद गौड़ ने संस्था का परिचय प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि नैतिक शिक्षा के अभाव में व्यक्ति जीवन के वास्तविक उद्देश्यों को प्राप्त नहीं कर सकता। उन्होंने विद्यालयों में नैतिक मूल्यों के समावेश पर विशेष बल दिया।
विषय प्रवर्तन करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार डॉ. अत्रि भारद्वाज ने कहा कि साहित्य का सबसे बड़ा गुण यह है कि वह कलात्मक ढंग से मानव के मस्तिष्क और हृदय दोनों को प्रभावित करता है। साहित्य के माध्यम से नैतिक मूल्यों का प्रभाव अधिक स्थायी रूप से स्थापित होता है।
प्रो. श्रद्धानंद ने कहा कि साहित्य में वर्णित कहानियाँ, महाकाव्य और आत्मकथाएँ महान व्यक्तित्वों के जीवन से परिचित कराती हैं, जिससे विद्यार्थियों में आदर्श चरित्र निर्माण की प्रेरणा मिलती है।
सिने-इतिहासकार एवं लेखक डॉ. राजीव श्रीवास्तव ने कहा कि रामायण, महाभारत और पंचतंत्र जैसी कालजयी कृतियाँ सत्यनिष्ठा, कर्तव्यपरायणता, न्यायप्रियता और मानवीय मूल्यों की शिक्षा देती हैं। वहीं डॉ. प्रेरणा मित्रा (जीडी गोयनका स्कूल, लखनऊ) ने कहा कि साहित्य के पात्रों के माध्यम से व्यक्ति दूसरों के सुख-दुःख और भावनाओं को समझना सीखता है, जिससे संवेदनशील समाज का निर्माण होता है।
सीबीएसई मास्टर ट्रेनर हेमा कलाकोटी ने कहा कि श्रेष्ठ साहित्य विद्यार्थियों में सहानुभूति, करुणा और संवेदनशीलता के बीज बोता है। वहीं नेहरू ग्राम भारती विश्वविद्यालय, प्रयागराज के हिमांशु शेखर सिंह ने साहित्य को समाज का दर्पण बताते हुए कहा कि लोककथाएँ, कविताएँ और कहानियाँ हमारी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखती हैं।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. देवेंद्र कुमार सिंह ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि विद्यालयों में प्रतिष्ठित साहित्यकारों एवं महापुरुषों की जीवनियाँ नियमित रूप से पढ़ाई जानी चाहिए, ताकि विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों का समुचित विकास हो सके।
वेबिनार में उपस्थित सभी वक्ताओं ने एक स्वर में साहित्य को नैतिक शिक्षा का प्रभावी माध्यम बताते हुए इसे विद्यालयी पाठ्यक्रम में अधिक व्यापक रूप से शामिल करने की आवश्यकता पर बल दिया।




