सनातनधर्मियों से कहा– एकजुट होकर करें धर्म व गौमाता की रक्षा
पूर्णिया (बिहार)। ज्योतिर्मठ के परमधर्माधीश, ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि “धरती की रक्षा तभी संभव है जब हम गौमाता की रक्षा करें। गौमाता ही धरती और भारत माता का चल प्रतीक हैं।”
पूर्णिया में आयोजित गौमतदाता संकल्प सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि जैसे तिरंगा और अशोकचिह्न भारत सरकार के प्रतीक हैं, वैसे ही गौमाता सनातन धर्म का प्रमुख प्रतीक हैं। सात आधारों पर टिकी धरती का पहला आधार गाय है, इसलिए गौमाता की सुरक्षा आवश्यक है।

शंकराचार्य ने कहा कि जब धरती माता असुरों से पीड़ित होती हैं तो वे गौस्वरूप धारण कर भगवान की शरण लेती हैं। तुलसीदास ने भी लिखा है “संग भूमि बेचारी गो तन धारी।” गाय की हत्या सुविचारित ढंग से की जा रही है जबकि गाय के घी से किए गए यज्ञ-हवन से देवता प्रसन्न होकर धर्म की रक्षा करते हैं। इसलिए योजनाबद्ध रूप से गौमाता की रक्षा करना आज समय की मांग है।
उन्होंने कहा कि सनातन समाज में किसी वर्ण को छोटा-बड़ा नहीं कहा जा सकता। “हम चारों वर्ण– ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र– एक ही विराट पुरुष से उत्पन्न हुए हैं। समाज को बांटने की कोशिशें सनातनधर्म विरोधियों की साजिश है। समय आ गया है कि हम आपस के वैमनस्य को त्यागकर मिलकर धर्म और गौमाता की रक्षा करें।”

राजनीति और धर्म पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि संतों को राजनीति से दूर रहने की सलाह देने वाले यह क्यों नहीं कहते कि नेता भी धर्म के क्षेत्र में हस्तक्षेप न करें। मंथरा प्रवृत्ति के विचार समाज को गर्त में ले जा रहे हैं, जिन्हें त्यागना ही होगा।

सभा में मौजूद भक्तों ने शंकराचार्य जी महाराज की चरण पादुका का पूजन और आरती की। इस अवसर पर संकल्प यात्रा संयोजक स्वामी प्रत्यक्चैतन्यमुकुंदानंद गिरी, श्रीलाल बाबा, श्री नीलमणि, सुबोध चौधरी व देवेंद्र पांडेय ने भी संबोधित किया।

कार्यक्रम की जानकारी शंकराचार्य जी महाराज के मीडिया प्रभारी संजय पांडेय व शैलेन्द्र योगी ने दी।






