बीएचयू विधि संकाय में राष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ

भौगोलिक संकेतक, नवाचार और सामाजिक-आर्थिक प्रभाव पर हुआ मंथन

 

 

वाराणसी। विधि संकाय, काशी हिन्दु विश्वविद्यालय में प्रॉपर्टी प्रो लीगल के सहयोग से आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय उन्नत सम्मेलन का शुभारंभ रविवार को हुआ। सम्मेलन का विषय “भौगोलिक संकेतकः नवाचार एवं सामाजिक-आर्थिक प्रभाव” रहा। इसमें देशभर से आए शिक्षाविदों, विधि विशेषज्ञों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने भाग लेकर भारत में भौगोलिक संकेतकों (जीआई) के उभरते आयामों पर गहन विचार-विमर्श किया।

 

सम्मेलन के मुख्य अतिथि पद्मश्री डॉ. रजनीकांत ने भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के पश्चात भौगोलिक संकेतकों के बढ़ते महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने अपने प्रारंभिक जमीनी अनुभव साझा करते हुए ऋण के दुष्चक्र में फंसे किसानों की पीड़ा का उल्लेख किया और इसे सामाजिक प्रदूषण की संज्ञा दी।

 

डॉ. रजनीकांत ने बताया कि बचत-साख योजना और स्वयं सहायता समूहों के गठन जैसी पहलों ने आगे चलकर सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण के स्वायत्त साधन का रूप लिया। इन पहलों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली और स्थानीय उत्पादों को पहचान मिली।

 

नीति निर्माण में अपने योगदान का उल्लेख करते हुए उन्होंने भौगोलिक संकेतक अधिनियम, 1999 के निर्माण से जुड़े अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि एलपीजी सुधारों के बाद विदेशी उत्पादों की बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच क्षेत्र-विशिष्ट वस्तुओं के संरक्षण के लिए व्यापक विधिक ढांचे की आवश्यकता थी। इस संदर्भ में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को आश्वस्त करने में निभाई गई भूमिका का उल्लेख किया।

 

डॉ. रजनीकांत ने वाराणसी एवं आसपास के क्षेत्रों से जुड़े कई उदाहरण प्रस्तुत किए। साथ ही, श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के निर्माण में प्रयुक्त करौली-बंसी पहाड़पुर के लाल पत्थर को जीआई संरक्षण प्रदान किए जाने की पुरजोर वकालत की।

 

प्रश्नोत्तर सत्र में विद्यार्थियों और शोधार्थियों ने भारत में जीआई व्यवस्था को और सुदृढ़ बनाने के लिए अनेक नवीन सुझाव दिए। जीआई से जुड़े नवाचार, विधिक संरक्षण तथा सामाजिक-आर्थिक प्रभाव पर सार्थक संवाद हुआ।

 

कार्यक्रम का औपचारिक शुभारंभ प्रो. सी.पी. उपाध्याय, अध्यक्ष एवं संकाय प्रमुख, विधि संकाय, बीएचयू ने किया। उन्होंने मुख्य अतिथि का स्वागत करते हुए समकालीन सामाजिक-आर्थिक परिप्रेक्ष्य में सम्मेलन की विषयवस्तु की प्रासंगिकता पर प्रकाश

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